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सुप्रीम कोर्ट का आदेश : हिंदू विवाह व घरेलू हिंसा कानून, दोनों में गुजारा भत्ता



• हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत केस जारी रहने तक विवाहिता को प्रति माह का गुजारा भत्ता मिलेगा घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 23 (2) के तहत अंतरिम भरण-पोषण भी साथ में मिलेगा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि तलाक की याचिका का निपटारा होने तक महिला को अपने पति से गुजारे भत्ते की रकम के अलावा घरेलू हिंसा कानून के तहत भी अंतरिम गुजारा भत्ता देना होगा। 

• यदि विवाहिता ने हिंदू विवाह अधिनियम और घरेलू हिंसा कानून दोनों के तहत गुजारे भत्ते का दावा दायर किया है तो उसे दोनों अदालतों द्वारा तय की गई अलग-अलग धनराशि मिलेगी। तलाक के जरिए पत्नी से छुटकारा चाहने वाले पति को दोनों कानून के अंतर्गत भरण-पोषण की रकम देनी होगी। 

• युवा दंपति के वैवाहिक विवाद में गुजारे भत्ते की धनराशि का निपटारा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस भ्रम को दूर किया कि विवाहिता को सिर्फ एक कानून के तहत ही अंतरिम राहत मिल सकती है। जस्टिस कुरियन जोसेफ और आर भानुमति की बेंच ने कहा कि महिला के शिक्षित होने का यह मतलब नहीं है कि उसकी आमदनी भी अपने पति के बराबर हो। 

• विवाहिता पत्रिका में काम करती थी लेकिन आर्थिक मंदी के दौर में उसकी नौकरी छूट गई। दूसरी ओर पति की की आमदनी अच्छी खासी है। पति से अलग रह रही पत्नी का जीवन स्तर पति के समकक्ष ही होना चाहिए। यह कानून है।सुप्रीम कोर्ट ने मनीष जैन की विशेष अनुमति याचिका पर यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। मनीष का विवाह आकांक्षा जैन से 2005 में हुआ था। वह दक्षिण दिल्ली के ग्रीन पार्क में रहते थे लेकिन बाद में हौज खास शिफ्ट हो गए। 

• मनीष ने सितंबर 2007 में तीस हजारी फेमिली कोर्ट में क्रूरता के आधार पर तलाक मांगा। पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24 का तहत गुजारा भत्ता मांगा। फेमिली कोर्ट ने उसकी अर्जी खारिज कर दी लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट ने पति की माली हालत और कारोबार से आमदनी को देखते हुए 60 हजार रपए प्रति माह का गुजारा भत्ता देने को कहा। यह धनराशि केस खत्म होने तक देनी होगी।

•  दूसरी तरफ, घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 की धारा 23(2) के तहत भी महिला को दस हजार रपए का अंतरिम गुजारा भत्ता देने का आदेश अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पति से अलग रह रही विवाहिता के पास नियमित आमदनी का जरिया नहीं है। उसने फैशन डिजाइनिंग में उच्च शिक्षा प्राप्त की है लेकिन उसके पास रोजगार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने पति के कारोबार और उसकी आय के मद्देनजर हाईकोर्ट के 60 हजार रपए प्रतिमाह के मेंटनेंस देने को आदेश को अनुचित कहा। 

• बेंच ने कहा कि यह राशि ज्यादा है। 25 हजार रपए प्रति माह भरण पोषण पर्याप्त होगा। इसके अलावा डीवी एक्ट में दस हजार रपए मासिक का गुजारा भत्ता अलग से देय होगा।

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