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नदियों की दुर्दशा के दोषी कौन


उत्तराखंड उच्च न्यायालय के निर्णय ने मां गंगा को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। हुआ कुछ यूं कि मोहम्मद सलीम ने यमुना किनारे अवैध निर्माण को हटाने के लिए याचिका दायर की। उनकी मांग थी कि नदी का दायरा तय किया जाए, लेकिन माननीय उच्च न्यायालय ने दो कदम आगे बढ़कर अवैध निर्माण को हटाने का आदेश देने के साथ ही गंगा और यमुना को जीवंत नदी और मनुष्य के समान अधिकार देने की बात कहकर एक नई बहस की शुरुआत कर दी। इसके साथ ही एक और आदेश आया जिस पर ज्यादा चर्चा नहीं हुई। उन्होंने राष्ट्रीय नदी अधिनियम प्रारूप समिति के चेयरमैन एवं गंगा महासभा के मार्गदर्शक न्यायमूर्ति गिरिधर मालवीय जी से आग्रह किया कि राष्ट्रीय नदी प्रबंधन कानून को जल्द से जल्द संसद के पटल पर लाने की व्यवस्था कराएं और उसमें उन सभी बातों को भी शामिल किया जाए जो उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने कही हैं। इस संबंध में 2009 में गंगा महासभा की एक चिंतन बैठक में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पूर्व चेयरमैन इंजीनियर पारितोष त्यागी ने एक प्रस्ताव रखा था और वह तत्कालीन प्रधानमंत्री को भेजा भी गया था, मगर हमेशा सत्ता तंत्र की हां में हां मिलाने वाले देश के कुछ वैज्ञानिकों ने कहा कि यह व्यावहारिक नहीं और अवैज्ञानिक भी है, क्योंकि इससे बहुत सारे प्रश्न उठेंगे जिनके जवाब देना मुश्किल हो जाएगा। 1काशी हिंदू विश्वविद्यालय में नदी विज्ञान के नामचीन वैज्ञानिक प्रोफेसर यूके चौधरी ने ‘गंगा एक जीवित शरीर’ नाम से किताब लिखकर इस विषय पर दो दशक पहले ही बहस प्रारंभ करा दी थी, मगर हमारी आम धारणा है कि तब तक हमारे आविष्कार और शोध को वैश्विक मान्यता नहीं मिलती जब तक कि विदेश से उन्हें प्रमाण पत्र न मिल जाए। ऐसी स्थिति में तीन ढलान के सिद्धांत और नदी एक जीवित शरीर जैसे विचार को कैसे मान्यता मिलती? यहां तक कि पश्चिम परस्त सोच वाले तथाकथित वैज्ञानिकों ने उसे अनावश्यक बताकर उसका उपहास उड़ाना शुरू कर दिया। उनके भेजे पत्रों को सरकार ने कूड़े के ढेर में डाल दिया। वह पत्र कहां है, किस हालत में है यह पता नहीं, परंतु जब न्यूजीलैंड की संसद ने अपनी एक नदी को जीवित शरीर के रूप में मान्यता दी तो भारत में भी ऐसी बौद्धिक चर्चाओं को पंख लग गए। अब अदालती फैसले से एक बार फिर इस चर्चा ने जोर पकड़ा है। प्रश्न यह उठता है कि अगर गंगा और यमुना जीवित शरीर हैं और मनुष्य के समान ही इनके भी अधिकार हैं तो क्या सरकार मानवाधिकार की तरह नदी अधिकार कानून नहीं बना सकती है? कुछ वर्ष पहले भारतीय मानवाधिकार आयोग के चेयरमैन वाराणसी प्रवास पर आए। उन्होंने गंगा में गंदगी देखकर सरकार को नोटिस जारी किया। तब मीडिया में यह खबर खूब छाई कि मानवाधिकार आयोग ने गंगा को मानव समान मानकर यह नोटिस भेजा है, लेकिन उस नोटिस का क्या हुआ, यह आज तक किसी को मालूम नहीं। अब अदालती आदेश से उसी चर्चा ने फिर जोर पकड़ा है कि भारतीय संविधान के अनुसार मनुष्य के साथ जिस प्रकार का भी अन्याय होता है उसके अनुसार अपराध की धाराओं में मुकदमे दर्ज कर कार्रवाई की जाती है। क्या ऐसी ही कार्रवाई गंगा और यमुना के लिए भी होगी? क्या ऐसी कार्रवाई दूसरे राज्यों में भी होगी, क्योंकि उत्तराखंड उच्च न्यायालय का अधिकार क्षेत्र उत्तराखंड राज्य तक सीमित है। क्या उसके क्षेत्रधिकार से बाहर की सरकारें भी उत्तराखंड उच्च न्यायालय के फैसले को स्वीकार करेंगी और इसे राष्ट्रीय नदी अधिनियम में सैद्धांतिक रूप से स्थान मिलेगा? उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल जैसे बड़े राज्यों के अलावा दिल्ली, हरियाणा और झारखंड जैसे छोटे राज्यों पर इस निर्णय का क्या प्रभाव पड़ेगा? जिस प्रकार मनुष्य के शरीर मेंनिश्चित रक्त प्रवाह का होना जीवन के लिए जरूरी है और जबरन ज्यादा रक्त निकालने पर हत्या के प्रयास जैसे मुकदमे दर्ज किए जाते हैं क्या उसी प्रकार नदी के पारिस्थितिकीय संतुलन को बिगाड़ने पर हत्या का मुकदमा नहीं दर्ज किया जाना चाहिए? 1क्या उप्र सरकार पर गंगा में शहरों का मलजल एवं रासायनिक जहर को गिराए जाने पर गंगा की हत्या का प्रयास करने जैसी धारा में मुकदमा दर्ज होगा? इसी प्रकार क्या बिहार के अंदर नदी जीवन के साथ छेड़छाड़ और बंगाल में रासायनिक अवजल को डालने पर मुकदमा दर्ज होगा? आज भारत उन परिस्थितियों में खड़ा है जहां पर विश्व के अन्य देशों की अपेक्षा नदी कानून, पर्यावरण कानून, जल कानून अभी शैशवकाल में हैं। अब जरूरत है कि इन्हें समझा जाए और समझ विकसित कर ठोस योजनाएं बनाकर आगे बढ़ा जाए। यक्ष प्रश्न है कि उत्तराखंड उच्च न्यायालय के आदेश के बाद विभिन्न धाराओं में गंगा एवं यमुना के साथ छेड़छाड़ करने का मुकदमा दर्ज होगा? अगर होगा तो किसके विरुद्ध? बांध बनाने वाली कंपनी के खिलाफ या राज्य अथवा केंद्र सरकार के विरुद्ध। 1(लेखक गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं

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